हम ना ही अनपढ़ है
ना ही गंवार है
मगर क्या करें साहब?
हम बेरोजगार हैं।

हम भी इस राष्ट्र के नागरिक हैं,
हमें भी अपने देश से प्यार है,
हमारा भी परिवार है।
मगर क्या करें साहब?
हम बेरोजगार हैं।

हमें कोई शौक नहीं बेवजह अपने प्राणों की बाजी लगाकर रेलगाड़ियों से लटककर यात्रा करने की,
लेकिन पेट के आगे लाचार है,
हर कुछ करने को तैयार है।
मगर क्या करें साहब?
हम बेरोजगार हैं।

ख़ून को पसीने में बहा कर दौड़ लगाते हैं,
अनाजों को बेंच कर मोटी रकम के फॉर्म भरते है,
फिर भी राष्ट्र सेवा की भावना लिए सड़कों पर धक्के खाते हैं।
लोगों के ताने सहते हैं,
अपनी व्यथा कहें किससे जाकर,
अतः एकांत में बैठकर रो लेते हैं।
हम इस भ्रष्टाचार के समक्ष लाचार है
मगर क्या करें साहब ?
हम बेरोजगार हैं


बेरोजगारी के साथ गालियों से नवाजा जाता है हमें,
मगर हार नहीं मानते हम।
फिर अगले दिन नई ऊर्जा, नई उमंग के साथ,
आंखों में चमक मन में कर प्रण, 
कस कर कमर तकदीरों से लड़ने के लिए तैयार हैं
मगर क्या करें साहब ?
हम बेरोजगार हैं

हृदय में एक आस लिए हुए डट जातें हैं मैदान में।
हमें विश्वास है अपने बाहुबल पर,
सफल होंगे अगले कदम पर,
मन में यह विश्वास है 
इसलिए हम यह करने को लाचार है।
क्योंकि हम बेरोजगार हैं।



               ✍️ प्रकाश तिवारी