आँखे खुली तो न अल्लाह दिखा न दिखा राम
केवल और केवल दिखा एक चेहरा
जिसके दिलों में हमारी रहती प्राण
वो चेहरा जिसे हम माँ कहते
वो माँ जिसकी मूरत नहीं होती
वो माँ जिसे आगे दूजी किसी की सूरत नहीं होती
वो माँ जिसके हम आँख के तारे है
वो माँ जिसको हम प्राणों से भी प्यारे हैं
वो माँ जिसने खुद भूखा रहकर
हमको रोज पेटभर खिलाया
वो माँ जिसने खुद प्यासी रहकर
खुद के सीने से लगा हमें अमृत पान कराया
वो माँ जो खुद गिले बिस्तर सोई
हमको गले लगा अपने तन के सूखे बिस्तर पर सुलाया
वो माँ हमारे सपने खुद बुनती है
वो माँ जो राह में भरे मेरे काटों को खुद चुनती
वो माँ जो मेरी एक मुस्कान के लिए
सारे जग से ऐसे ही लड़ जाए
वो माँ जो मेरी एक खुशी के
अपने भले ही पग पग ठोकर खाए
वो माँ जिसने सब कुछ त्यागा
मुझको शसक्त बनाने को
वो माँ जिसने मेरे सफलता की
हर राह बनाई मुझे सफल बनाने को
उस माँ को मेरा सत सत प्रणाम
मेरा सिर सदैव उस मंदिर में झुक जाए
उसके गोद में ही मेरा दिन बिते
उसी के ममता के छांव में जीवन बन जाए
सर्वेन्द्र मिश्र "विरक्त"


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