थोडा बहुत नाराज है आज किश्मत  हमारा 
आज  मरकर भी पैदल चलें मिलों अपनी सफर 
भुख से सुखी ओंठ और सांसों का टूट जाने पर
नहीं रूकेंगे हम अपने कर्मों का हम  राह नापगें

लेकिन याद रहेगा जीवन भर वह चीखें हमें
वह धूप में चलते समय पैरों में उभरे झाले पर 
वह नेताओं वह पूंजीपति इंसानियत कंगालों
हम भी तुमसे उस समय का हिसाब मांगेगे

जिस समय तुम आने गांवों में हमारे घर 
अपना बता वोट लेने के लिए उस समय 
हम भी तुमसे कोई पहचान नहीं मांगेंगे 
बस हम उस समय मौतों का हिसाब मांगेगे

ना दारू न पैसा ना उपहार से पिघलेंगे हम 
ना जाति धर्म का अभिशाप मांगेगे
बस एक छोटी सी गुज़ारिश रहेंगी 
आपसे हम उस समय कहां है रोजगार मांगेगे