सदियों से क्या कुछ सहा नहीं,
थे, कष्ट अपार
फिर भी तुससे कुछ कहा नहीं
तेरे हर जुल्म को
प्रतिपल मैने सहन किया
फिर भी अपने समग्र प्रेम को ।
तुझपे ही तो वहन किया ।
जल, हवा,ईधन ,फल, फूले।
पवन नदिया वन कंद मुले ।
क्या कुछ तुमको दिया नहीं।
कौन सा प्रेम करती तुम्हारी जननी तुझसे।
जो मैने तुमसे किया नहीं ।
मेरी सन्तान तो तुम्ही हो ।
फिर गैरो सा बर्ताव क्यू करते हो।
अपनी क्षणिक मस्ती को ।
मुझे क्यू रोज कुचलते हो ।
क्यु करते तुम धरती का समग्रनास ।
क्यु करते तुम प्रकृति का सहस्त्र उपहास।
क्यु रोज मुझे अपने भारो तले दबा ते हो।
क्यु रोज मुझे अपने हथियारों तले दहलाते हो ।
क्यु रोज प्रदूषित करते मुझको ।
अपने उन गति गर्जन से ।
जब प्रकृति विकराल रूप धारण करेगी तो क्या होगा ।,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
बहुत हुआ प्रकृति नाश ।
बहुत हुआ मेरा उपहास ।
बहुत सब्र न मेरा अब चलने वाला।
बहुत हुआ, अब दाल न तेरा गलने वाला
क्यु संकट खुद के अस्तित्व पर डाले हो।
तुम कुछ न समझने वाला हो ।
तुम ही नर हो, तुम्ही नारी
यह अनमोल काया फिर न मिलने वाली ।
जब मैं गर्जन घोर करूंगी ।
अपना विलाप और क्षोभ कहुगी ।
नक्षत्र निखर टकराएगे ।
सब चुर चुर हो जाऐगे ।
मानवता पर तब काल घिरेगा ।
मेरा स्वरूप विकराल घिरेगा ।
शरण न कोई देने वाला होगा
मानव को मानव के काम न आएगा ।
सब घरों में कैद हो रहा जाऐगे।
मानव, तेरा सौभाग्य तुझी पे फुटेगा।
जब प्रकृति का अदृश्य काल तुझी पर टूटेंगा।
आएगी ऐसी प्रचंड प्रकोप।
कर न पाऐगा अपनों का कोप।
चहुओर मंडराता काल दिखेगा ।
महामारी विकराल दिखेगा ।
चहुओर मृतकों से पटी भूमि होगी।
प्रकृति का काल चक्र चतुरड्गिणी घूम होगी।
तेरा वैभव न गाने वाला होगा।
न तुझे अपना कोई जलाने वाला होगा ।
चुभती वेदनाओ का दमन न तुझसे होगा ।
आएगी प्रलय की
ऐसी ज्वाला जिसका शमन न तुझसे होगा ।
काल का पहिया ऐसा घूमेगा।
कोई कहीं न झूमेगा।
कहीं प्यासे बिलबिलाएगे।
कही डुब डुब मर जाएगे ।
भूखा पेट चहूओर नाचेगा।
अपना दुष्परिणाम ही बाचेगा।
सब पर दोष मढा जाएगा।
आरोप प्रत्यारोप गढा जाएगा ।
सब अस्त्र धरे ही रह जाएगे।
सब धन से भरे ही रह जाएंगे ।
बेचैनी ही छाऐगी सब पर आफत लाऐगी।
प्रभु द्वार भी बंद हो जाऐगे ,जब धर्म से धर्म टकराऐगे।
खेतों की हरियाली को ,चेहरे की यो लाली को।
जलो से भरी प्याली को वनों मे रहते वन माली को।
केवल इतिहास में जाना जाऐगा।
मनुष्य के कर्म फुटेगे ऐसे की।
मानव खुद इतिहास बन जाएगा ।
सारे औषधि संसाधन ,तुझको मैंने दान दिया ।माया विद्या ज्ञान हिमालय ,सा तुमको वरदान दिया ।
पर तेरे कंक्रीट कि दुनिया ,तुझको न छाया दे पाऐगी।
डगमग डगमग धरती डोलेगी ,काल फणि मुख खोलेगी।
समा जाऐगे तेरे समस्त भुवन,वनों में आग ऐसी होगी ।
कभी न बुझने जैसी होगी ,सब कीट पतंगे जर जानवर ।
उसमें रोज समाऐगे ,मेरे नियमों को तोड़कर।
तेरी गलती का वह भी हिसाब चुकाऐगे।
सर्वेन्द्र मिश्र " विरक्त"


0 टिप्पणियाँ