यह काशी बड़ी निराली हैं
सब शहरों से मतवाली हैं
कहीं पान की गहरी लाली हैं
तो मित्र अर्जुन और आली हैं

जहां गलियां भी खूबसरत हैं
बसा महादेव का मूरत हैं
अन्नपूर्णा की दमकती सूरत हैं
जहां नशे को बस चाय ज़रूरत हैं

वो शीतल सी एक गंगा हैं
और ऑटोवालों से पंगा हैं
दुख तो खूंटी पर टंगा हैं 
और बाबा के प्रसाद पर अडभंगा हैं

कोई साधू तो कोई सन्यासी हैं
कुछ मृत देह मोक्ष को प्यासी हैं
जहां हर कलाकार देव का दासी हैं
और पान की दुकान पर राजनैतिक प्रत्याशी हैं

जहां कला और अध्यात्म का संगम हैं
ना ही कोई धर्म जाति का बंधन हैं
हर पर्यटक का ह्रदय से अभिनंदन हैं
ख़ुदा की इबादत तो भोले का वंदन हैं

जहां मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र हैं
तुलसीदास और गंगाआरती का मंत्र हैं
दुर्गा मंदिर का भाक्तिक तंत्र हैं
यह पूरा शहर ही अर्धचंद्र हैं

काशी की एक माया हैं
मोक्ष फल सबने पाया हैं
शिवशंकर की करुण काया हैं
तभी तो बनारसियों की अलग छाया हैं।


          श्रेया भट्टाचार्य  " काशी "