चाहे घर हो या ऑफिस..
अपने काम में वो एक दम परफेक्ट थी..
रिश्ता हो या कागज के पन्ने..
ईमानदार सबके साथ रहती थी..
पर ना जाने हर बार ऐसा भी क्या होता..
उसका काम को ना देखा जाता..
ना ही मिलता उसे प्रोमोशन नामक प्रसाद..
ना ही उसे सराहा जाता..
एक दिन जब थक हार आईने के सामने गई..
और खुद से वो बोली,
कँहा कमी रह गई खुद में,
क्यों मिलता हर बार निराशा का साथ..
तभी..हा तभी..
आईना से एक अक्स बाहर आया,
और बोला,
मत हो तू उदास,और सुन तू मेरी बात..
ज़रा खुद पर भी ध्यान दे,
अपने चेहरे को तू संवार ले..
क्योंकि ये दुनिया है पागल सूरत के पीछे,
सीरत को तो वो ईश्वर है देखता..
लेकिन इस भीड़ में बनानी है खुद की पहचान,
तो थोड़ा अपनी सूरत भी तू सम्भाल ले..

                      प्रीति