तो क्या हुआ मैं एक औरत हूँ,
हूँ तो एक इंसान ही ना,
क्यों ना हक मुझे,
अपने सपनों की उड़ान का,
कहते है जननी मुझे,
फिर क्यों ना जाने जाते वो मेरे नाम से यँहा,
क्यों पड़े जरूरत मुझे किसी नर की यँहा,
जबकि मैं खुद हूँ नारी,हर नर मेरे अंदर समाहित यँहा,
कहते है दया की मूरत मुझे,
पर फिर भी दिखाए सब दया मुझ पर यँहा,
देखे हर कोई मुझे अपनी भूख मिटाने को,
ना प्रेम दिखे किसी की आंखों में यँहा,
जब ना आऊं उनके हाथ,
तो ना आए बाज वो जोर आजमाइश से यँहा,
तो क्या हुआ मैं एक औरत हूँ,
हूँ तो एक इंसान ही ना।

दोगले इंसानों से भरा पूरा जँहा यँहा,
करे पूजा देवी की,
पर नारी का अपना वजूद ना गंवारा यँहा,
पति को परमेश्वर माने सारा जँहा,
पर पति ये ना समझे ,
क्यों कहलाये ईश्वर परमेश्वर यँहा,
आज के पति केवल पति है,
ना है वो परमेश्वर यँहा,
तो क्या हुआ जो मैं एक औरत हूँ,
हूँ तो एक इंसान ही ना।

विद्या की देवी को पूजे,
हर नर यँहा,
पर ना नवाज़े घर की बेटी को,
विद्या से यँहा,
जब जब ससुराल में मारी जाती है बहुए,
तब तब उतना ही गुनाहगार होता है मायका भी यँहा,
क्योंकि ना दे सका इतना अधिकार उसे वो,
कि लौट सके वापस अपने बाबुल के द्वार यँहा,
तो क्या हुआ मैं एक औरत हूँ,
हूँ तो मैं एक इंसान ही ना।

जिस जिस घर में जन्म लेती है बेटियां,
खुशनसीब मानो खुद को,
क्योंकि जब ईश्वर  होता है खुश,
तब  तब जन्म लेती है बेटियां वँहा,
तारती है दो कुलों को,
बेटों के मुकाबले,
हर पैमाने पर लायक होती है ये बेटियां।

समझो नारी की भी मनोदशा,
माँगे बस वो अपना आत्मसम्मान यान,
ना भीख दो,
ना दया,
बस सर उठा कर जी लेने ही दो,
तो क्या हुआ मैं एक औरत हूँ,
हूँ तो एक इंसान ही ना।

अभी भी देर नहीं हुई है,
दे दो हमें हमारा सम्मान यँहा,
चल सकूँ बेखौफ सड़क पर,
किसी भी वक़्त यँहा,
नहीं दिया तो,
तो उठा के देखलो तुम शास्त्र यँहा,
पार्वती ने ही धरा था काली का रूप यँहा,
तो क्या हुआ मैं एक औरत हूँ,
हूँ तो एक इंसान ही ना।

     प्रीति