आज लतिका और सुनील की शादी की सालगिरह है।हर साल लतिका को इस दिन का इंतजार रहता था।
उसको आज दुल्हन की तरह सजाया जा रहा था।सुर्ख लाल साड़ी,लाल चूड़ियां से भरे मेहँदी रचे हाथ,माथे पर बिंदी लगाई गई।जब मांग में सिंदूर लगाना था तब उसकी ननद अंजना ने अपने भाई सुनील, लतिका के पति, को बुलाया।
सुनील ने लतिका को देखा,उसकी मांग भरी।उसे वो हमेशा की तरह मोहक लगी,पर आज जैसे रूठ सी गई है वो।कोई शिकायत नही कर रही ।
सुनील अपने अंतर्मुखी स्वभाव के कारण बहुत कम बोलते थे।और उनका प्रेम का प्रदर्शन तो आँखों से ही हुआ करता था।लतिका हमेशा उससे तारीफ के दो शब्द सुनने को तरसती रही।बावजूद इसके वो जानती थी सुनील उसे बहुत प्यार करते है,वो उनकी हर अनकही भावनाओं को समझती थी,कैसे न समझती उसने भी तो दिल की गहराइयों से उन्हें चाहा।
सुनील के स्वभाव से विपरीत लतिका चंचल, हर वक्त मुस्कुराने वाली,हर चीज की शौकीन चाहे सजना हो या घूमना हो,खाना बनाना हो या खाना खाना।कभी जब दोनों में नोकझोंक होती तो लतिका को भी गुस्सा आ जाता था पर वो अधिक देर नाराज नही रह पाती थी और स्वयं ही सुलह की तरफ कदम बढ़ा देती थी।
पर आज वो एकदम शांत थी,चुप थी उसे ऐसे देख सुनील की आँखे आंसुओं से भरी थी।उनकी बेटी निधि ने दिलासा देने के लिये अपने पापा के कंधे पर हाथ रखा पर खुद को नही सम्हाल सकी और रो पड़ी।
नियति के हाथों मजबूर थे सब,लतिका उन्हें छोड़कर जा चुकी थी।उसकी अचानक मृत्यु से सब शोकमग्न थे।आज वह घर से हमेशा के लिये जा रही थी उसी तरह सजधज कर , एक दुल्हन जैसे जिस तरह वो इस घर में ,उनके जीवन में आई थी।जिस दिन से सुनील और लतिका का साथ जुड़ा उसी दिन उनका साथ छूट गया।
प्रीति ताम्रकार

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