वो हर वक्त 
मुझे मेरा मुक़ाम याद दिलाता है,
चुल्हे-चौके में 
मेरे ख़्वाबों को जलने से
हर रोज बचाता है,
हाँ,
वो पागल है 
कभी-कभी मेरे
सपनों को मंज़िल तक पहुँचाने
के लिए, 
कभी अपनों से 
तो 
कभी जमाने से टकरा जाता है।

शायद 
उसके लिए 
मर्द की अपनी 
एक अलग ही परिभाषा है,
वो अपनी हमसफ़र के
बड़े-बड़े ख़्वाबों से नहीं 
कभी घबराता है,
ज़िंदगी के डगर में
वो हमेशा 
उसके साथ नज़र आता है,
हाँ,
वो पागल है
अपनी हमसफ़र के
 सपनों को पूरा करने के लिए
रूढ़िवादी सोच से 
कभी-कभी जीतता नज़र आता है।

वो अपनी 
जीवनसंगिनी को
किसी डोर में बांध कर 
नहीं रखना चाहता है,
शायद वो एक वीरांगना का
सपूत है
इसलिए हर औरत को समान
अधिकार दिलाना चाहता है,
उन्हें अपने से एक कदम आगे रख
खुद को 
अपने अस्तित्व की निर्माता
की परछाई में
ढूँढना चाहता है,
हाँ,
वो पागल है
मेरे सपनों को उड़ान देने के लिए
कभी-कभी वो लोगों की
झूठी पुरुषवादी सोच के ख़िलाफ़
नज़र आता है।

तुझे कौन बाँध सकता है,
तू तो मस्त हवा का 
झोंका है,
तू मदमस्त-सी 
बहती जलतंरण है,
तेरी ख़ुशबू से ही
महकें घर का आँगन
और चुल्ला-चौका,
अक्सर 
मेरे सम्मान में
ये कहता नज़र आता है,
हाँ,
वो पागल है,
जीवन के हर सफ़र में 
हमेशा मेरे साथ 
नज़र आता है।।❤️
 
-आरती वत्स✍🏻✍🏻