खुशहाली का जहां सवेरा, हो सूकून का पहरा
अपनों  के  संग  जीवन  बिताऊं, वही अपना, बसेरा हो।

सीमेंट ईंटों से बना हुआ हो,कोई पक्का मकान,
या छोटी सी झोपड़ी, जर्जर होते जिसके प्रान।

माता-पिता से सास ससुर हो ,बहू को मिले बेटी 
सा सम्मान।

बच्चों को बुजुर्गों का,प्यार और संस्कार  मिले,
जहां नारी खिलखिलाती सुबह और शाम मिले।

जीवन के हर सुख दुख में,अपनों का प्यार और, साथ मिले।

घर की नींव हो मजबूत ,एकता, प्रेम, विश्वास ,
संपूर्ण ज्ञान और प्रेम युक्त सुंदर व्यवहारों  से।

घर का हर कोना  हो  सुवासित , समर्पण  के संस्कारों से।

सास  ससुर रहे पूरे  सम्मान और अधिकार से ,
बहू खिलखिलाती मिले पूरे आत्मसम्मान  से।

जहां प्रेम की बहती गंगा धारा हो,वही अपना  बसेरा हो।


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            अम्बिका झा