सुखे हुऐ दरख्त पर कभी हमको नाज था।
उसकी दुआ का आपदा वो बेआवज था।।
कस्मे कभी वादे कभी" सरगोशीया कभी।
पतझड का शौक था उसे" वो नादान था।।
फसता गया रकीबो की" वाहवहियो मे वो।
करता रहा गुस्तखिया" वो गुस्ताख़ था।।
फरेब की चाहत मे "गुजार दी ज़िन्दगी।
जब भी मिला "उसके दिल में फरेब था।।
खुद को गर्त कर लिया "नशे की चाह मे।
पत्ते झड चुके हैं वो" सूखा दरख्त था।।।
रीमा महेन्द्र ठाकुर

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