खुद से खुद की पहचान पूछती है वो
बेटी,पत्नी ,माँ के किरदार बीच बस 
जूझती रहती वो।
पिता,पति,बेटे का घर है उसका ठिकाना
क्या कभी बसा पायेगी वो
अपने खुद का आशियाना?

पढ़ लिख कितना भी....
कमाने नही जायेगी
तू घर की इज्जत है
यूं  बाहर निकल...
क्या नाक हमारी कटवाएगी?

जितने पैसे चाहिये मुझसे माँग..
पर घर की चारदीवारी से 
पग ना बाहर तू निकाल।
अपनी हर  जरूरत के लिए
आदमी के आगे हाथ वो फैलाती

क्यों हमारे घर की बहू बेटियाँ 
आत्मनिर्भरं नही बन पाती?

बेटी हुई...कोई नही...
बस अब इसको ब्याहना है
दुनिया की बुरी नज़रों से बचाकर
अब घर इसका बसाना है

सपना तो उसका डॉक्टर इंजीनियर बनना है...
पर 'बेटी होना' ही उसकी नियति तय कर देता है।

एक घर की बेटी एक घर की बहू बन जाती
ज़िंदगी उसकी कमरे से रसोड़े तक सिमट जाती।

चेहरे से ज्यादा घर वो चमकाती....
"पूरा दिन घर मे क्या करती"'
...का फिर भी रोज उल्हाना वो पाती।

कब तक रहेगी वो पिंजरे की कैद में...?
उड़ने दो उसको भी सारा आकाश मे
फ़ैलाने दो उसको भी अपने पंखों को 
ताकि ढूंढ सके अपने
 अस्तित्व की कोई तो पहचान वो।


          प्राची गोयल गुप्ता