जिम्मेदार कौन !! यह वह चुभता हुआ प्रश्न है मेरे आज के लेख का, जिसका जवाब हम आगे ढूंढने का प्रयत्न करेंगे ।
आधुनिक परिवेश में एकल परिवारों की बढ़ती भीड़ में दादा-दादी का महत्व जैसे खो सा गया है । प्राचीन काल में संयुक्त परिवार का प्रचलन था, पूरा परिवार एक साथ रहता था उसका कारण भी था, ज्यादातर घर के पुरुष आसपास ही कोई नौकरी या व्यवसाय करते थे.. अगर दूर जाना भी होता था तो परिवार (पत्नी व संतान) अपने माता-पिता के संरक्षण में ही छोड़कर स्वयं दूसरे शहरों की ओर जाते थे ।
परंतु धीरे-धीरे समय बदला और ऐसा महसूस हुआ कि यदि पुरुष किसी कारणवश अपने शहर से बाहर यदि नौकरी करता है, तो उसके साथ उसकी पत्नी और बच्चों का रहना भी आवश्यक है । समय की मांग के साथ ही आधुनिकता ने भी पंख फैलाए पति-पत्नी साथ रहने लगे.... अब जबकि पति-पत्नी ही साथ में रहते हैं, तो बच्चे भी सिर्फ अपने माता-पिता के साथ ही रहेंगे.. तो फिर ऐसे में दादा-दादी कहीं पीछे छूट जाते हैं ।
देखा जाए तो इसमें गलत भी क्या है, ये भी नितांत आवश्यक है कि पत्नी को अपने पति का सानिध्य मिले और पति को भी इधर-उधर किसी भी आवश्यकता के लिए भटकना न पड़े, पति पत्नी का प्रेम साथ में रहने से और बढ़ता है... और उनके प्रेम के प्रतीक उनके बच्चों को उन दोनों का ही भरपूर प्रेम मिलता है, लेकिन क्या केवल माता-पिता का प्रेम ही बच्चों के विकास के लिए सर्वथा उपयुक्त है ??
माता-पिता अपने बच्चों को प्रेम तो बहुत देते हैं परन्तु वो लाड़, वो दुलार और वैसा संरक्षण नहीं दे पाते जोकि अब माता-पिता से दादा दादी बन चुके अनुभवी बुजुर्ग दे पाते हैं । क्योंकि बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए केवल सामरिक शिक्षा ही उपयुक्त नहीं है, उसमें अनुभव का मिश्रण होना भी बेहद आवश्यक है ।
फिर अनुभव भी ऐसे ही नहीं आता... जब कोई अपने आप को कर्म की वेदी पर तपाता है, तब अनुभव का स्वाद चख पाता है । घर में बड़े बुजुर्गों का होना, उनका सानिध्य बच्चों में एक नई ही ऊर्जा और नए ही ज्ञान का संचार करता है । ऐसी बहुत सी बातें हैं जो माता-पिता चाह कर भी बच्चों को नहीं सिखा पाते क्योंकि उन्होंने इसका अनुभव ही नहीं लिया होता है ।
अपने बच्चे को नवीनतम विषयों का आधुनिक सुख-सुविधाओं का ज्ञान देना ही पर्याप्त नहीं है, आज कितने ही बच्चे होंगे जिन्हें मंत्रोच्चार रामायण, भागवत गीता या अन्य पौराणिक साहित्य अथवा उनके बारे में ज्ञान होगा ?? फिर ऐसा भी नहीं है कि आजकल के बच्चे होशियार नहीं होते, परंतु जब उनकी ज्ञान की कच्ची मिट्टी में दादा दादी का अनुभव भी मिल जाता है तो एक नया ही वृक्ष तैयार होता है, जोकि हर प्रकार की परिस्थिति के लिए अपने आप को तैयार कर पाता है ।
एकल परिवारों में आपसी आजादी तो बहुत मिलती है, परंतु कभी-कभी मर्यादा में रहने के लिए उस पर अंकुश का पेंच लगाना भी आवश्यक होता है । ज्यादातर घरों में पिता ऑफिस चले जाते है, मां घर के कामों में व्यस्त होती है,या फिर दोनों ही ऑफिस जाते हैं । एक या दो बच्चे होते हैं, जो या तो साथ में या अकेले बस अपनी ही दुनिया में मस्त होते हैं । उनके हाथ में नए-नए गैजेट्स होते हैं, जिसके द्वारा उनके कोमल मस्तिष्क एक नई सपनीली दुनिया में तैरने लगते हैं, और उसे ही सच मानते हैं । इसके विपरीत घर में यदि दादा-दादी हो तो वे बच्चों के साथ समय बिताते हैं । उन्हें नई-नई बातें बताते हैं, जिससे बच्चों का मानसिक विकास तो होता ही है, साथ ही बच्चे यथार्थ को भी धीरे-धीरे अपने में समाहित करना शुरू कर लेते हैं ।
मैंने देखा है एकल परिवार में बच्चों की विडंबना को, माता-पिता के पास समय नहीं होता, बच्चा अपने लिए कसमसाता रहता है, जो बोलना, बतलाना तो चाहता है, पर कोई सुन नहीं पाता, क्योंकि माता-पिता में बच्चों की जिज्ञासा को शांत करने का संयम ही नहीं है, इसके विपरीत यदि घर में बड़े बुजुर्ग हैं,तो वह बच्चों की अनगिनत जिज्ञासाओं को शांत करते रहते हैं, और खींझते भी नहीं है, क्योंकि इस उम्र तक धैर्य तो आ ही जाता है ।
बच्चा जिज्ञासु होता है, नई पौध है, उसमें जितना खाद डालेंगे, जितना पानी डालेंगे, पोषित करेंगे, उतना ही फलदार वृक्ष तैयार होगा । परंतु आजकल माता-पिता सोचते हैं कि चलो बच्चा मोबाइल देखता रहे, अपने किसी काम में व्यस्त रहें, तो ज्यादा प्रश्न ना करें और उनके कामों में बाधा ना डालें, उससे बच्चे के मन पर बड़ा ही विपरीत प्रभाव पड़ता है । ना केवल बच्चे एकाकी महसूस करते हैं बल्कि सबके साथ घुलने- मिलने से भी कतराते हैं । और अगर अपने एकांत को दूर करने के लिए वे बाहर झूठी मित्रता के भंवर जाल में फस जाते हैं तो उस से निकलना भी बेहद मुश्किल होता है । क्योंकि घर में रहना उन्हें पसंद नहीं होता और बाहर की दुनिया की सच्चाई का उन्हें आभास नहीं होता ।
एक और समस्या मैंने महसूस की है, यदि कोई बच्चा अपने माता-पिता के साथ दूसरे शहर में रहता है, तो यदि वह अपने दादा-दादी के पास जाता है, और वहां अगर पहले से ही उसके चचेरे -फुफेरे और भाई बहन हैं, तो उनमें घुलने-मिलने के बजाय, वह हमेशा उन सब के बीच अपने आप को असहज महसूस करता है, क्योंकि साथ में रहने की वजह से उन सब की आपस में बहुत बनती है, पर बाहर से आया बच्चा उस फ्रेम में अपने आप को फिट नहीं कर पाता है, और परिवार से कटता चला जाता है ।
ऐसा भी महसूस किया है कि जो बच्चे कभी कभी-कभी दादी-बाबा के यहां जाते हैं, उनको या तो उनको दादी-बाबा का अतिरिक्त प्यार मिलता है, कि यह तो कभी-कभी आते हैं, यह विशेष है, वह विशेष का टैग उनके कजिन भाई-बहनों पर बुरा असर डालता है, जिससे वो अपने मेहमान जैसे भाई-बहन को दिल से अपना नहीं मानते हैं, बल्कि उसे अपना प्रतिद्वंदी मानते हैं । जिससे आपसी संबंध में कटुता आती है ।
इसमें भी गलती परिवार के बड़ों की ही होती है, क्योंकि हर किसी को अपने बच्चों को इस प्रकार से समझाना आना चाहिए कि वह हर परिस्थिति में सबके साथ घुल मिल भी जाए और अपनापन भी बना रहे । द्वेष और प्रतिद्वंदिता परिवार में ना आने पाए ।
एक तीसरा कोण यह भी है कि कई परिवारों में दादा-दादी भी अपनी जड़ों से दूर न होने की इच्छा के चलते अपने बेटे-बहु के पास रहना नहीं चाहते हैं, जिससे वे स्वतः ही अपने परिवार से दूर होते चले जाते हैं, उन्हें भी अपनी उपयोगिता सिद्ध करनी होगी, किसी दायित्व को निभाकर नहीं क्योंकि दायित्व तो वे पूर्ण कर चुके, बल्कि अपने बच्चों और पोते-पोतियों को अपना अमूल्य समय व संस्कार देकर ।
अब कई लोग यह कहेंगें कि बहुए सास-ससुर को रखना नहीं चाहतीं तो भई कुछ पाने के लिए कुछ समझौता भी करना पड़ता है। कुछ बदलाव बुजुर्गों को करने होंगे तो कुछ सहनशीलता बेटे-बहू को भी दिखानी होगी । आखिर ये नई पीढ़ी के भविष्य का सवाल है ।
अगर परिवार में दो-तीन बेटे हैं तो बुजुर्गों को सबके साथ समय बिताना चाहिये, यह सत्य है कि कहीं उनका ज्यादा मन लगेगा तो कहीं कम पर उनके समय और संस्कारों पर आखिर अधिकार तो उनकी प्रत्येक संतान का है ।
हर परिवार में बड़े बुजुर्ग, दादा-दादी घर की वह नींव होते हैं जो जितनी अधिक गहरी और मजबूत जड़ो से जुड़े होते हैं, वैसे ही उस वृक्ष की शाखाएं फलती-फूलती हैं । इसलिए परिवार में बड़े बुजुर्गों की उपस्थिति आज भी उतनी ही आवश्यक है, जितनी कि पहले हुआ करती थी ।परंतु इस परिस्थिति का जिम्मेदार कौन है यह हमें स्वयं समझना होगा और निदान भी ढूढ़ना होगा, ताकि आने वाली पीढ़ी अपने बुजुर्गों के सानिध्य से वंचित न रहने पाए ।
धन्यवाद
सौम्या पांडे "पूर्ति"

0 टिप्पणियाँ