जब भी चाहा किसी का साथ है, 
सिर्फ थामा खुद में खुद का हाथ है, 
कहने को कितने चेहरे देते हमारा साथ है, 
पर  सच में ना पाया किसी का हाथ है।। 

हँसने हँसाने को तो भीड़ भी कम पड़ जाती है, 
हँसने हंसाने को तो  भीड़ भी कम पड़ जाती है, 
पर  दर्द  में ना आया कोई साथ है।। 

ऐसे तो ना कह सकती कि ना पाया कोई दोस्त खास है, 
कयोंकि कितने ही है यहाँ जिन्हें पाया दिल के पास है, 
पर फिर जब आया कोई दर्द खास है, तब पाया केवल खुद में खुद का साथ है,
कितने है संगी साथी,कितने दिल के खास है, 
पर जो मन को समझे, ना पाया किसी का साथ  है।। 

हर दर्द के बाद खुद को बस ये सोचते पाया है, 
करू खुद को इतना मजबूत,ना तलाशु किसी का साथ, 
पर इस मन ने चाहा किसी न किसी का साथ है।।



 

                     प्रिती