जिया है हमने पोस्टकार्ड के उस दौर को जब एक इंतजार रहता था किसी के जबाब का एक अजीब ही कशिश होती थी उस इंतजार में एक एक लफ्ज में जज्बात पिरोए जाते थे इतनी भावनाओं से भरे होते थे अल्फाज लिखने बाले के चेहरे पोस्टकार्ड के पन्ने में उभर आते थे।
कहने को वो शब्द होते थे पर शब्द भी शालीनता की सियाही से कुछ यों लिखे जाते थे शर्म झिझक साफ झलकती थी।
मां का पत्र ममता से भरा होता था,बहन का पत्र समझ सहानुभूति से भरा होता था,पिता का पत्र अनुशासन के पालन से भरा होता था उन शब्दों में भी प्यार छुपा होता था।
पति का पत्र प्रिया के लिए बस दो बातों से लिखा होता था बच्चों और माँ बाबूजी का ख्याल रखना।उनके बीच लिखा ख्याल रखना उसमें एक गूढ़ रहस्य छुपा होता था जो बस वो ही समझ पाती थी।
जब वो घर आता वो शिकायत करती मुझे कुछ क्यों नही लिखा आपने , तब प्यार से कहता ख्याल दो बार लिखने का मतलब दूसरा बाला ख्याल तेरा ही था पगली .
प्रेमी के लिए प्रेमिका का पत्र रंगों से भरा ,हर रंग हर अपनी अलग ही
दास्ताँ कहता था,
बाकई गजब था वो दौर चिठिया का,
जरा से कागज में था हाल जिया का
कहि थी बहन की बतियाँ
कहीं लिखा था दर्द मइया का,
कहि थी बाबुल की सीख
कहि था प्यार भइया का
कहीं था सन्देशा मित्रों का
कहीं प्रिय ने लिखा था
कब आओगे साजन मोरे
तक तक राह थके नयना भोरे
निकाल रखा था उस बिरहन ने
उस चिठिया में अपना हिया था,
बैठी मै पनघट पे केश बिखेरे,
कब आओगे प्रियतम मेरे,
देख ले आकर मेरी हालत,
क्यों तड़पायें मोह छलिया सा,
अंजू दीक्षित
बदायूँ
उत्तर प्रदेश,

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