विधा-दोहा"
सर्दी मे मन की व्यथा,मन ही जाने मर्म।
ओढ रजाई सोईये,तन हो जाये गर्म
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माँ गँगा के घाट की, महीमा अपरम्पार।
कोहरे मे कुछ न दिखे,क्या देखे सँसार।
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लकडी कन्डे सब जले ,जल कर बन गये राख।
सिकडी हीटर सब थके,शीत हुई न खाक।
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सर्दी करे ठिठोली 'ठंड दिखाऐ आँख।
बच्चे मेरे सहोदरे,बुढवे मानऐ माख।
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सर्दी से कांपित्त हुऐ ,ठिठुरत सारे अंग।
शादी ब्याह की धूम मे,मन मे नही उमंग।
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है गरीब की झोपडी,,हवा बहे चहुँ ओर।
अमीरो के ठाट है,गर्म हवा का शोर।
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किसी तरह से कट रही ,अपनी दिन और रात,
सारी ऋतुऐ कट गई ,अब काहे की बात।
रीमा महेन्द्र ठाकुर (लेखिका)
रानापुर ,झाबुआ -मध्यप्रदेश

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