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रिश्ता अपना सबसे पावन
कान्हा तुम मैं तुम्हारी जोगन

मोर मुकुट माथे पे सजाके
मुरली अपनी मधुर बजाके 
मोह लिया करते सबका मन
कान्हा तुम मैं तुम्हारी जोगन

रिश्ता अपना सबसे पावन

कब से तेरी राह निहारुं
कृष्ण कृष्ण कहके मैं पुकारुं
तुम जाकर बस गए वृंदावन
कान्हा तुम मैं तुम्हारी जोगन

रिश्ता अपना सबसे पावन

माखन मिशरी तुम्हे खिलाऊं
तरह तरह के भोग लगाऊं
कभी पधारो मेरे आंगन
कान्हा तुम मैं तुम्हारी जोगन

रिश्ता अपना सबसे पावन

न मैं मीरा न मैं राधा
न जानूं कुछ इससे ज्यादा
जीवन मेरा तुमको अर्पण
कान्हा तुम मैं तुम्हारी जोगन

रिश्ता अपना सबसे पावन

हाथ जोड़कर करूं निवेदन
स्वीकारो प्रभु मेरा समर्पण

रिश्ता अपना सबसे पावन
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                             –प्रीति ताम्रकार
                                जबलपुर