जो तुम नहीं
तो कुछ भी नहीं
ये मौसम की बहार,
तुमसे ही,
ये प्रेम मुग्ध सा मेरा मन,
तुमसे ही,
ये नए पकवानों का स्वाद,
तुमसे ही,
ये पहली बारिश की मौज ,
तुमसे ही,
ये खूबसूरत एहसासो की सौगात,
तुमसे ही,
जो तुम नहीं,
तो कुछ भी नहीं।
ये मेरी प्रार्थना का असर ,
तुमसे ही,
ये मेरी कुछ कर गुजरने की आरज़ू,
तुमसे ही,
ये मेरे होठो पर वो मुस्कराहट,
तुमसे ही,
ये उस आसमां को मुट्ठी में भरने की चाहत,
तुमसे ही,
ये मेरे होने का वजूद,
तुमसे ही,
तुम हो तो,
लगे ये जीवन बसंत सा,
जो तुम नहीं,
तो कुछ भी नहीं।
प्रीति

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