क्युं उलझा रखा है खुद को ज़माने के बनाये दस्तूर में
क्यूँ अपना दायरा सिकोड़ रखा है किसी गुरूर में
फ़क़त चाँद की ख्वाहिश रखने से क्या हासिल होगा
क्यों खुद को बेवज़ह बहकाये बैठा है किसी सुरूर में
चंद कदमों का फासला तय करने से क्यूं डरता है
क्या सोचता है , क्यूं डूबा रहता है किसी गुरूर में
वक़्त से पहले किसी को कुछ हुआ है क्या हासिल
वक्त हासिल है तुझको , न रहना तूँ किसी फितूर में
कुछ फासला कम करने की हिम्मत गर है निराला
वक्त चलकर आएगा पास, राह पाओगे तुम मसरुर में
मसरुर.... खुसी
सुरूर.... नशा
फितूर... विकार, बहकावे में
गुरूर.... घमंड
संजय निराला

0 टिप्पणियाँ