⚘⚘⚘ॐ⚘⚘⚘⚘⚘ 
समुंदर के जैसी खारी हो गई हूं मैं,

माँ बाबा का घर छोड़ चली--

हो गई सुहागिन नारी  हो गई हूं मैं,

बिताए लम्हे जीवन में सुख दुखके

सुख से बहुत खुशियां मिली दुख से बहुत अनुभव हुए-

अनुभवों को समझते समझते खारी हो गई हूं मै,

निभाई सज्जनता प्रत्येक रिश्ते हर एक एक शख्स से--

क्या रिश्ते थे वह सज्जन, पूछती हूं मैं अपने अक्ससे  

कांटे भरे इस जीवन में एक सबक यही सीखा है,

 मैंने हर शख्स को यहां रंग बदलते देखा  है,

देख रंग बदलती दुनिया को खारी हो गई हूं मैं,

  बदला है अपना स्वरूप,

   हां कल नारी थी ,आज खारी   नारी हो गई हूं मैं,
           
समुंदर के जैसी खारी हो गई हूं मैं
      
संगीता वर्मा✍✍