मेरा भी मन करता है
कान्हा के रंग रंग जाऊँ
बन जाऊँ रज ब्रज की
ब्रज धरा पर पड़ इतराऊँ
पड़े जहाँ पग कान्हा के
उस देव भूमि में मिल जाऊँ
संतों की पग धूरि से
मैं भी पावन हो जाऊँ
मेरा भी मन करता है
कान्हा के रंग रंग जाऊँ।
बन जाऊँ मैं मटकी माटी की
यमुना नीर से भर जाऊँ
भाता है जो माखन कान्हा को
उस नवनीत से खुद को भर जाऊँ
हाथ लगे मटकी पर कान्हा के
या उस कर खुद को फोड़ा जाऊँ
मेरा भी मन करता है
कान्हा के रंग रंग जाऊँ।
बन जाऊँ मैं दिव्य बयार
ब्रजमंडल को सुरभित कर जाऊँ
श्वास छोड़ते जहाँ पर कान्हा
उस ब्रज को सुवासित कर जाऊँ
राधे- राधे की गुँजन को
मिल समीर धरा पर फैलाऊँ
मेरा भी मन करता है
कान्हा के रंग रंग जाऊँ।।
रचनाकार:- आशा झा सखी

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