मै स्वछन्द ,उड रही थी,
पँखो को ,फैलाकर"""""
कुछ पल जीने की चाहत"
थी,स्वछन्द """
मुडकर देखा,खूबसूरत दो,
आँखे,झाँकती कही""""""
अन्तर्मन मे ,मै रुक कर ,
तलाशती उनमे अपनी,
बेलगाम सी धडकन""""""""
और जी लेती ,कुछ पल"
अपलक निहारती मुझे"
जैसे ,जन्मो का रिश्ता"
जुडा हो कोई""""""
नही समझ पाती मै"
मन की बात,शायद "
ताकाजा,है समय का"
जब अच्छे पल बिखर गये""
तो बुरे भी बिखरेगें""""""
पर तब जाने कितने "
मास्क उतरेगे ,इस चेहरे
से....तब कहा छुपाओगे"
अपनी,बदकिस्मती'"""""
झूठी सवेदांनाऐ"मेरा क्या"
मेरे पँख,फिर से उग आऐगे"
तालाश लूगीं,फिर से स्वछन्द"
आकाश ,"""खुद को ,माफ कर "
पाओगे कभी"""""""
अब मत करना ,किसी से वादा"
जब ,निभाने की हैसियत नही,
रखते,जीते जी पाषाण बन जाता"
वो शख्स ,जो निभाता है,इसांनियत"
और सच्चा ,वादा""""""
और हो जाता सदा के लिऐ मूक"""""
रीमा ठाकुर🙏🙏🙏🙏🏼🙏🏼🙏🏼

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