बाबुल तेरे बाग की मैं चिड़िया,
एक दिन मैं उड़ जाऊँगी।

कहां - कहां ढूढोगें मुझको,
मैं फिर कहीं नजर नहीं आऊंगी।

चले जाना ही नसीब है मेरा,
एक दिन मैं चली जाऊँगी।

जिस घर में जन्म लिया
जब वो ही घर मेरा नहीं

तो अब और कहाँ मैं अब घर बनाऊंगी।
सबसे रिश्ता तोड़ कर

       नये रिश्ते फिर जोड़ कर
      मैं कैसे मन को समझाऊँगी।।।।। ।।।।।


                मुकेश दूहन
           सोनीपत हरियाणा