वो अब मेरा हाथ बंटाने लगी हैं
स्कूटी से बाजार ले जाने लगी हैं
खुद कभी अनुशासन से चिढ़ती थी जो
छोटे भाई को अनुशासित बनाने लगी हैं
थाली में सब्जियां देख मुंह बनाती थी कभी
अब बासी रोटी का पिज्ज़ा बनाने लगी हैं
घर के कई काम अपने जिम्मे लिये हैं
वो दोनों संग मेरे घर सम्हलवाने लगी हैं
उन्हें सारे शौक मेरे पता हैं
वो उत्साह मेरा बढ़ाने लगी हैं
कभी जो अकेला वो पाती मुझे
देती सहारा, ढाढस बंधाने लगी हैं
कभी जो सिसकती हूँ मैं मन ही मन में
न जाने कैसे मेरा दर्द जानने लगी हैं
कभी थी नादां, अब हो रही सयानी
वो दोनों सहेली सी लगने लगी हैं
–प्रीति ताम्रकार
जबलपुर

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