स्त्री- पुरुष के‌ दायरे,
समाज में इनके मायने,
कौन‌ तय करता है ?
परिवार,जाति,समाज, धर्म या किताबी ज्ञान,
 ये जिम्मेदारी और कामकाज का विभेद,
ये उच्चता- निम्नता का भेद,
ये पौरुष या स्त्रीत्व के द्वैत,
 गर्भ से ही क्यों तय कर दिए जाते हैं,
या कर्म को धर्म से,
जोड़ने के दुस्साहस क्यों किए जाते है?
कितने अनसुलझे संस्कार बचपन‌ में ही भर दिए जाते है,
कर्मफल के भय से 
भयभीत किए जाते हैं,
बचपन से पचपन तक
वो इसी सही-गलत में ,
ऊच-नीच,तेरी -मेरी 
और राग-द्वेष में ऊहापोह में उलझता,
कहां वो जीवन के रहस्य समझता,
खिलौने‌ ,कपड़ों और जीवन के रंग,
बोलने,चलने‌ और समझने के ढंग,
सांचों में तय कर दिए जाते,
बातों ही बातों में द्वैत कर दिए जाते,
एक पुरूष क्यों स्त्रैण चित् नहीं हो सकता,
वह सामाजिक  
मान्यता से क्यों भिन्न ना हो सकता, 
स्त्री का अस्तित्व भी सबला‌ का  हो सकता है,
उसका अर्थ बेटी,बहन,बहु के अलावा भी हो सकता,
वो बुद्धिमती विवेकी हो सकती,
नर‌ से नारी भी स्वतंत्र- भिन्न हो सकती,
नाहक न छिनो हर किसी के जीने के अर्थ,
मत करो व्यक्तित्व को‌ छिन्न-भिन्न ,
जैसी स्थिति जैसा समय  वैसे कर्म होने चाहिए,
निस्वार्थ निष्प्रयोजन
 रिश्तों के धर्म होने चाहिए,
मत बांटों रंग,जाति, धर्म कर्म से किसी के कर्म,
शोषण करने से पहले मन में रखा करो शर्म,
 अब स्वर्ग-नरक की कल्पना से निकल चले
कर्मफल से मुक्त इंसानियत के पंथ पर चले ..



                  ***मीनाक्षी मीरा***