मैं हूँ अरब से आया हुआ घोड़ा ।
मैं आपको कहानी सुनाता हूंँ, अपना खुद का किस्सा
बात १६ वीं शताब्दी की है जब भारत में अंग्रेज थे।
मध्यप्रदेश में राज्य था ,राजा ,रानी और उनका बेटा खुशी पूर्वक रहते थे। राजा ने वह घोड़ा खरीदकर यानी मुझे अपनी रानी को तोहफे में दिया। क्योंकि रानी को घुड़सवारी बहुत पसंद थी, रानी साहिबा बहुत वीरांगना थी ,अच्छे से युद्ध कला जानते थी ।
समय का चक्र घुमा और एक युद्ध में राजा शहीद हो गए।
रानी का बेटा उस वक्त 8 साल का था।
रानी ने उसके जन्मदिन पर घोड़ा उसे दिया और घुड़सवारी सिखाने लगी।
लगभग 2 साल में राजकुमार अच्छे से मुझ पर बैठकर घुड़सवारी करता था।
पास में ही अंग्रेजों की छावनी थी, जब वह मुझे देखते तो लालायित नजरों से देखते थे।
कितना सुंदर घोड़ा है ,इसका रंग ,कद ,काठी का घोड़ा हमने कभी नहीं देखा।
उस अंग्रेज अफसर की नजर मुझ पर पड़ी और एक दिन उसने राजकुमार समेत मुझे पकड़ लिया।
मुझे अपने वहां अस्तबल में बांध दिया और राजकुमार को पैदल जाने के लिए कहा।
मैं बहुत हताश हुआ खुब मैंने कोशिश की पर उनकी जंजीरों को नहीं तोड़ पा रहा था।
युवराज कुमार रानी के पास रोता - रोता गया तो रानी बहुत गुस्से में हुई ।रानी क्रोध में गरज कर बोली
कि घोड़े को वहीं छोड़ा है; इसका मतलब अपनी हार स्वीकार कर ली, मुझे खुशी तब होती बेटा तुम उस अंग्रेज अफसर के साथ लड़ते हुए शहीद हो जाते।
रानी ने उस अंग्रेज अफसर के खिलाफ युद्ध का मोर्चा खोल दिया।
युद्ध करीब 10 दिन तक चला ।
रानी के सैनिक बड़ी वीरता से लड़ रहे थे ।अंग्रेजों को बहुत मार रहे थे।
किंतु रानी के पास पुराने हथियार थे जैसे तीर तलवार और अंग्रेजों के पास बंदूकें थी , बंदूकें के और तोपों के आगे सैनिक ज्यादा देर टिक नहीं पा रहे थे।
अंग्रेज अफसर को पता था कि अब रानी का रशद भी खत्म हो रहा है। धीरे-धीरे सैनिक भी मर रहे हैं।
उन्होंने संदेश भिजवाया की रानी एक घोड़े की खातिर पूरा राज्य नष्ट मत करो। हार मान लो घोड़ा हम नहीं देंगे
रानी ने कहा वह केवल घोड़ा नहीं है हमारी आन बान शान है
हम घोड़ा नहीं देंगे भले ही मर जाए।
अब बात घोड़े से हटकर अपनी मातृभूमि और आन बान शान पर आ गई थी।
युद्ध में रानी अकेली पड़ गई और अपने बेटे को पीछे बांधकर ले युद्ध करते करते आगे बढ़ रही थी।
अंग्रेज छावनी में घुस आई।
मौका देख कर मुझे वहां से आजाद कराया।
मैं अपनी पीठ पर रानी और राजकुमार को लेकर बेहद तेज दौड़ा।
दौड़ते दौड़ते हम नदी पार कर रहे थे पीछे से कई सारी गोलियां चली और हम तीनों घायल हो रहे थे बुरी तरह
किसी तरह मैं रानी व राजकुमार को लेकर उनकी राज्य की सीमा में पहुंचा और रानी ने बड़े प्यार से मेरी पीठ पर हाथ फेरा और मैंने दम तोड़ दिया और मेरे साथ साथ रानी और राजकुमार ने भी।
कहने को रानी भले ही हार गई थी। मगर अंग्रेजों की नीवं उन्होंने हिला दी थी। जो राज्य अपने घोड़े के लिए कुर्बानी दे सकता है और अगर गलती से इनकी मातृभूमि पर नजर डाली तो वह हमारा क्या हाल करेंगे?
भारत माता की जय !
वंदना शर्मा

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