संस्कृति का उत्थान है, 
उमंगों का त्यौहार है,

डोर संग बंधी पतंग 
उड़ती है आकाश में, 

उमंगे  हिलोरे  खाती है,
उल्लास है परवान चढ़ा, 

सक्रांति का त्यौहार ये, 
मनभावन है प्यारा बड़ा ,

दिन अपने  उत्थान पर, 
आज से है दिन बड़ा, 

व्यंजनों की महक से आज,
हर रसोई घर महका, 

खेल रहे हैं पारम्परिक  खेल
सितोलिया और गुल्ली डंडा, 

आओ हम भी परंपरा का 
यू करे निर्वाह अब, 
दान करें पुण्य करें, 
खुशी देकर खुश हो जाएं अब. 🙏



                       कृष्णा सिंहा 
                       चित्तौडग़ढ़