अपने पिता की बेटी थी मै 
परी थी ,राजकुमारी थी मै ,
दुनियाँ रुपी इस उपवन मे 
छोटी सी एक कली थी मै 

अपने पिता की लाडली थी मै 
और माँ की परिछाई थीं मै ........

जीवन के इस एकाकी पथ पर 
कभी यहाँ तो वहाँ बंधी थी मै ,
और माता पिता का घर छोड 
पति के संग संग चली थी मै ।

सेविका पद स्वीकार करी थी मै 
पति के रंग मे ऐसे ढली थी मै 
ससुराल सदा हित भाव हुयी मै 
रक्तद्वैष से बस्तु बनी थी  मै ।

अपने पिता की लाडली थी मै
और माँ की परिछाई थी मै .......

अनेको कमियो के प्रश्न सही 
ना हुयी किसी की भी लाडली 
फिर ना हुयी किसी की अंश सगी 
जिसके उपयोग की जो हुयी मै 
बस प्रयोग किया सब ने मेरा ही ।

जब असहाय हुआ ये तन मेरा 
तब साथ ना दिया कोई ने मेरा 
कभी समझ न पायी मै ......
कौन है अपना ,कौन पराया ।

थक चुकी अब हार गयी मै 
विश्वास नही जग के नाटक मे
न रहा मोह अब ,न कोई माया है 
समझ गयी मै जीवन की सच्चाई को

ईश्वर से अब न्याय माँगने मृत्यू द्वार
पर खडी हूँ मै ,शव शैय्या पर पडी हूँ मै ।

नोट --यह व्यथा नारी पीडा की सच्ची घटना पर आधारित है 
एक स्त्री की सहनशक्ति का अंत मृत्यू पर्यन्त ।।




            मीनाक्षी शर्मा
        भोपाल मध्यप्रदेश