गर्मी की छुट्टियाँ शुरु हो गयी थी।मै हर साल की तरह अपने बच्चों को लै कर घर जाने की तैयारी कर रही थी पर इस बार माँ के स्वर्गवास के बाद से घर जाने को बिल्कुल मन नही था ।पर वही छोटी बहन और मासी के कहने पर मैं घर जा रही थी।घर जाने पर सब के साथ खूब मस्ती की और सब बच्चों के साथ कैसे 7 दिन बीत गए पता ही नही चला।जिस दिन मेरी वापिसी थी उस दिन सब की लाडली होने के कारण कोई कपड़े,कोई,अचार,कोई महँगा सामान तो कोई पैसे तो कोई कुछ दै रहा था।पर मै थी कि अपनी आंखों की नमी को छुपाते हूऐ, हर साल जो माँ मैरै को देती थी उसकी कमी महसूस कर रही थी ।तभी मेरी छोटी बहन पास आ कर "दैनिक भास्कर" की मधुरिमा वाले सारे पन्नों को पकड़ाती हूऐ बोली कि क्या हुआ माँ नही अब हमारे साथ पर इतना तो हम सब जानते ही है कि आप को मायके आ कर चाहिये ।बहन की बात को सुन कर मैंने धीरे से उसको गले लगा कर नमी वाली आँखों से मुस्कराते हुऐ इस अनमोल उपहार के लिये शुक्रिया किया।।।
मधु रतन
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