वैराग्य यदि चिर सत्य है,
तो मोह माया भी परम सत्य है ।
वैरागी चाहे कितना भी हो बड़ा,
मोह  जाल से ना वो बच सका ।

ऋषि मुनि भी  ना बच पाए ,
मोहमाया के प्रेरित बंधन मे।
विश्वमित्र भी कैसे फंस गए ,
मेनका के मादक रूप जाल में।
ययाति ने  यौवन के मायाजाल  मेंं,
निज पुत्र को ज़रावस्था मेंं पहुंचाया।
माया का वर्चस्व  रहा  हर युग में,
माया के विविध रूप है इस जग में।

दशरथ ने तज दिए प्राण  
उन्हें थी पुत्र से अति मोह माया।
सीता की रूप जाल में  रावण ने 
निज प्राण को गंवाया।
मोह से ग्रसित राजा ने  पुत्र को,
निज  महल में ही बंदी बनाया।
माया के परिणाम स्वरुप ही 
बौद्ध धर्म आया।

रूप की माया ,
धन की माया
संतान की मोहमाया,
है सभी प्राणियों में समाया।
मोह माया नहीं रहेगी तो 
इस जगत का क्या होगा 
किस चीज को त्याग कर
प्राणी वैराग्य लेगा ।।

नहीं रहेगी यदि उसकी,
किसी चीज से आसक्ति।
किसे तजकर वह  करेगा प्रभु की भक्ति।
कलयुग में मोहमाया का वृहद जाल है।
छोटे से बड़े सभी लोग इस,
मोह माया जाल से  बेहाल हैं।
नेताओं को अपनी कुर्सी से बहुत मोह माया है।
जनता को लूट लूट के पैसे बैंक में छुपाया है ।
कहते हैं माया महा ठगिन है।
हर इंसान को ठग रही है ।
लेकिन परोक्ष रूप से आत्मज्ञान की जननी है।
वैराग्य का कारण है।
माया और वैराग्य का
पुराणों में वृहद उल्लेख है
इनका आपस मेंं अद्भुत तालमेल है ।
मनुष्य की जिजीविषा ही मोहमाया है।
तो वैराग्य है  मोक्षमार्ग।
मोह माया मेंं फंसकर मनुष्य,
भूल जाता है जीवन का सार।

स्नेहलता  पाण्डेय
    नई दिल्ली