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शाम को कोचिंग से छुट्टी होते ही हम सीधे चाय की दुकान की तरफ भागते थे चाय पीने नहीं........उसको देखने वो रोज़ उस चाय के दुकान के सामने से ही गुज़रती थी वो काली आँखों वाली लड़की जो पटना के मछुआ टोली की भीड़ भरी सड़कों पर खुद से ही बातें कर चलती थी और हम उसके पीछे-पीछे लेफ्ट राइट किया करते थे।
शायद! उसका होस्टल उस चाय की दुकान के आसपास ही था, वो काली आँखों वाली लड़की हमारे कोचिंग में ही पढती थी पहली नज़र में ही हम अपना दिल दे चुके थे उसको, उसे एक नज़र निहारने के लिए उस चाय की दुकान पर ना जाने हम कितने ही चाय के कुल्हड़ खत्म कर चुके होंगे, उसका नाम तक पता नहीं था हमें बहुत बार सोचे भी कि डायरेक्ट जाकर उससे नाम पूछ लेते हैं फिर सोचे कि भीड़ से बोलकर कहीं हमको थुरवा दी तो क्या करेंगे और नाम में क्या रखा है अब हम रांझणा वाले कुंदन तो थे नहीं कि पहली बार में ही जाकर लड़की को अपने दिल की बात बता दें फिर सोचे अभी तो कोचिंग खत्म होने में बहुत दिन है आराम से पूछ लेंगे कभी,
साला कोई दोस्त भी तो नहीं था जो झूठी सहानुभूति देकर और दो चार गालियां देकर हमारे डर को खत्म कर दे,
दिन बीतते जा रहे थे और यहाँ हमारी चाय की कुल्हड़ की गिनती भी बढती जा रही थी, सरस्वती पूजा की छुट्टियां भी आ गईं कोचिंग की छुट्टी मिल चुकी थी हमारा कमरा कोचिंग से और उस चाय के दुकान से लगभग 5 किलोमीटर की दूरी पर था छुट्टियों में भी हम हफ्ते में 3-4 दिन कुल्हड़ की गिनती बढाने आ ही जाते थे इस उम्मीद से कि शायद वो कहीं गलती दिख जाये लेकिन वो एक दिन भी नहीं दिखी हमने सोचा हो सकता है छुट्टियों में अपने घर चली गई हो क्योंकि पटना के कोचिंगस् में सरस्वती पूजा की अच्छी खासी छुट्टियां मिलती हैं जैसे-तैसे छुट्टियां खत्म हुईं और कोचिंग भी शुरू हो चुकी थी हम उस दिन एक घंटे पहले ही कोचिंग चले गये और उस चाय के दुकान पर जाकर बैठ गये हमें वहां बैठे लगभग एक घंटे से ऊपर हो गये थे फिर हम सीधे कोचिंग की तरफ भागे ये सोचकर कि क्या वो पहले ही निकल गई हो हम भागे-भागे कोचिंग में पहुंचे और हमारी नज़र सीधे उस सीट पर गई जहाँ वो बैठा करती वो वहां नहीं थी वहां कोई दूसरी लड़की बैठी हुई थी....
उसके सीट पर कोई दूसरी लड़की बैठी हुई थी, हमने सोचा...!! क्या पता आज वो किसी दूसरी सीट पर बैठी हो हमने जल्दी क्लास में चारों तरफ अपनी नज़रें घूमाईं कि कहीं वो दिख जाये लेकिन वो कहीं पर नहीं थी, हम ये सोचकर अपने सीट पर जाकर चुपचाप बैठ गये कि क्या पता वो अभी अपने घर से आई ना हो लेकिन हमें उम्मीद थी कि कल वो जरूर आयेगी,
कोचिंग की छुट्टी हो चुकी थी हम सीधे उस चाय की दुकान पर जाकर बैठ गये जो उसके होस्टल के पास था उस रोज़ चाय में वो स्वाद नहीं था जो हमेशा हुआ करता मानों कि उसको देखकर चाय और भी ज्यादा स्वादिष्ट लगने लगती थी, करीबन 9 बज चुके थे हम भी अपने रूम की तरफ निकल लिए उस दिन हमने खाना भी नहीं बनाया सीधे जाकर सो गये।
अगले शाम हम कोचिंग आ गये थे हम सीधे कोचिंग में ही जाकर बैठ गये अभी कोचिंग में कोई नहीं आया था फिर धीरे धीरे बच्चे आने शुरू हो गये हमारी नज़र गेट पर टिकी हुई थी उसके इंतजार में लगभग सारे बच्चे आ चुके थे और वो आज भी नहीं आई उसकी जगह पर फिर कोई दूसरी लड़की बैठी हुई थी, हमें समझ नहीं आ रहा था कि कैसे पता करें उसके बारे में क्योंकि कोचिंग में वो किसी दूसरी लड़की से ज्यादा बात भी नहीं करती थी, दिन यूंही बीतते जा रहे थे और यहां हम समझ नहीं पा रहे थे आखिर करें तो करें क्या उसके बारे में पता कैसे करें? फिर हमें ध्यान आया कि... उसके बगल में एक लड़की अक्सर बैठा करती थी उस लड़की को हमने कभी-कभी उसके साथ छुट्टी में बात करते भी देखा था हमने सोचा इससे ही पूछ के देखते हैं क्या पता इसी से कुछ पता लग जाये अगले दिन हम छुट्टी में उस लड़की के पास गये जो उसके बगल में बैठा करती थी,
हमने उससे पीछे से आवाज़ दी- 'सुनिये....!!'
वो एकदम से चौंक कर हमारी तरफ देखने लगी और बोली- 'हाँ.... बोलिए',
हम एक साँस में ही बोल दिए- 'वो लड़की जो आपके बगल में बैठा करती थी वो आज कल क्लास आती क्यों नहीं है, उसका नाम क्या है...'
वो बोली- 'कौन सी लड़की'
फिर हम उसको बताये- 'अरे! वही जो अक्सर आपके बगल में बैठा करती थी जिसके साथ आप कभी-कभी छुट्टी में बात भी करती थीं वो नीले बेग वाली'
'अच्छा हाँ, वो निधि' -सामने से जवाब आया,
निधि नाम है उसका हम सोचते हुए बोलते हैं....
'उससे आपको क्या वैसे आपको उससे क्या काम है' -सामने से हमारे लिए फिर सवाल आता है,
हम सोचने लगे अब क्या बोलें इसको फिर हम एकदम से बोल दिए बस कुछ काम था उनसे हमको...
सामने से जवाब आता है- 'अच्छा......!!'
उसके मुंह से इतना बड़ा अच्छा सुन कर हम डर गये कि कहीं इसको हम पर शक तो नहीं हो गया न,
फिर उस लड़की ने हमें बताया कि....
'निधि ने बताया था कि वो सरस्वती पूजा के छुट्टियों में घर चली जायेगी और फिर पटना लौटकर नहीं आयेगी अब वो वहीं किसी कोचिंग में पढेगी'
ये सुनकर जैसे हमारे पैरों के नीचे से जैसे ज़मीन खिसक गई हो हम वहीं खड़े रह गये वो लड़की भी हमें ये बता कर वहां से जा चुकी थी और हम वहीं खड़े थे,
हमारी कहानी शुरू होने से पहले ही खत्म हो चुकी थी वो कहानी जो एक कोचिंग में शुरू होकर कोचिंग में ही खत्म हो गई, हम भी उसको भूलने की कोशिश करने लगे ज़रा मुश्किल था लेकिन नामुमकिन नहीं, अब कोचिंग में खाली पढने जाते थे, उस चाय के दुकान पर भी कभी कभार, भुला-भटक कर चले जाया करते थे इस बार किसी को निहारने नहीं......... सिर्फ चाय पीने के लिए, चाय भी अब पहले जैसी नहीं लगती थी, मछुआ टोली की भीड़भाड़ सड़कों पर भी अब वो सुकून नहीं था जो पहले हुआ करता था, अब हर शाम पहले की तरह गुलजार नहीं लगती थी जैसे तैसे 9 महिने गुज़र गये और कोर्स भी पूरा हो गया, हमने भी पटना छोड़ दिया।
{कुछ अधूरी रह गई कहानियां मुकम्मल हुई कहानियों से ज्यादा खूबसूरत होती हैं...❤️}
✍️ मंटू

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