समाज तू बता कब और 
कहां  सहायक बना.. ?
बता तो सही कब सत्य का सारथी बना..?
मैंने टूटते देखा बेबस पिता को,
तेरे आगे नतमस्तक हो,
अकेलेपन और तिरस्कार से 
संतप्त और विवश हो,
 विवश होते देखा मां को
सहारा पाने के लिए,
कितने जतन करती थी
 मां कुरीति को बदलने के लिए ,
वो  विरोध कर भी लेती जब शोषण के लिए,
दंडित किया जाता हरबार उसे बेबाकी के लिए,
 पिता को मजबूरन चुकाने होते पंचों के नतीजे,
कितने कठोर होते थे पंचायतों के फैंसले,
जिसकी लाठी भैंस उसके पक्ष में होती थी,
अबलाओ पर भी दया तब  कहां होती थी,
कहां गलत थी मां की वो जीने की शर्तें,
बच्चों को सरकारी नौकरी दिलाने के उसके सपने,
कहां गलत किया  बेटियों को पढाकर उसने ,
तलाक और विधवा प्रथा का विरोध जताया गर उसने,
क्यों वो कुरीतियों को तोड खुशी 
से दंडित होती,
क्यों अपने और बच्चों की स्वतंत्रता के लिए लडती,
क्यों गलत था समाज में 
प्रेम के गीत गाना उसका,
घर घर गांव गांव राम धुन गाना उसका,
कहां गलत था उसका अपने अंदाज से जीना,
क्यों किया समाज से बहिष्कृत उन्हें,
क्यों किया बेवजह उपेक्षित‌ उन्हें,
क्यों इतना संकुचित समाज का होता अर्थ,
क्यों न होता सहयोग समाज का धर्म,
जब अकेली स्त्री समाज में कुछ अनूठा करती,
पुरानी परम्परा के विरोध में मर मर करके वो जीती 
जब वो करती नये सामाजिक सृजन,
उसका समाज क्यों न कर पाता अभिनंदन,
उसका बनाया समाज क्यों कर नहीं हो पाता स्वीकार,
जहां मिले समान कर्म,भाव और विचार,
जहां धर्म,जाति, मज़हब और ओहदे का न हो भेदभाव,
जहां सिर्फ मैत्री, प्रेम और करुणा का हो भाव,
जहां सहयोग ,समता और समानुभूति हो,
हर कमजोर के प्रति सहयोग सहानुभूति हो,
यहीं  समाज का सच्चा अर्थ क्यों नहीं हो जाता हैं.?
यहीं समाज का सच्चा धर्म क्यों नहीं  हो जाता है..?

*मां और पिता को  समर्पित*




                @मीनाक्षी एस.एस."मीरा"
                     माउंटआबू, राजस्थान