आईने! अब तो तू भी, जानता नहीं है मुझे
शायद हर रोज ,बदल जाती है सूरत मेरी
हर रोज टूटकर जुड़ना,आता है मुझे
तुझसे भी नहीं ,मिलती है अब फितरत मेरी
टूटकर रोऊं ,पर कैसे , तू ही बता दे मुझे
अब तो आंसू भी नहीं करते ,वकालत मेरी
वजह हर दर्द की ,अपने भी पता है मुझे
दिल में उम्मीद का होना ही है खता मेरी
कोई उम्मीद न दो खैर,अब जीने दो मुझे
जान ले लो मगर उम्मीद न तोड़ो मेरी.....
.....…..✍️🙏🌄 ऋतु बाजपेई

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