तेरी  मादक सी मुस्कान..
मन के तारों को छेड़ गई। अंतर में एक मीठी सी... टीस उकेर गई।

 
कटीले नैनों से देखकर.. तुम्हारा मुस्कुराना ।
मेरी हल्की सी छेड़ पर... उन्मुक्त खिलखिलाना।
झरने सी हंसी मन में.... अमृत उड़ेल गई।

 रसीले अधरों से....
 अमृत लुटाना........ चंचल चितवन किए..... ढेर सारा बतियाना।
तिरछी भौंहें दिल को....  अंदर तक भेद गईं।

सुर्ख और सुर्ख.......
होते रहे कपोल.........
खिलते रहे ज़्यूं ज़्यूं......प्यार भरे बोल।
लाज भरी पलकें......  सारे राज खोल गईं।

स्वर्गीय प्रेम शंकर पाण्डेय गोरखपुर