भारत के कोने कोने में विविध मौसम का प्रभाव होता है,
हरिद्वार -ऋषिकेश तरफ तो भारी ठंड का भार होता है।
बात है शरद ऋतु की, साथ यहाँ के गंगा तट की,
यहाँ का सुबह का नज़ारा स्वर्गो से भी सुंदर होता है।
पर्वत माला, पेड़ पौधों तथा पंछीओ के कलरव से घिरी,
ऐसी नीली गंगा नदी मानो नील गगन का आईना है।
कोहरा देख लगता जैसे गंगा ने ओढ़ी हो बादलों की चद्दर,
ये बादल आज नीचे कैसे जो रहते थे सदा अद्धर!?
सूर्योदय देरी से होता मानो रुक रुक कर वो निकलता है,
इतने सुंदर नज़ारे को छेड़ने से शायद वो भी डरता है।
पर जब उसकी प्रथम किरण धुन्द को भेद पानी को छूती है,
ठंड में ठिठुरती प्रकृति में नयी ऊष्मा और जान आती है।
अब श्रद्धालु भक्त जनो का आवागमन शुरू होता है,
देश- विदेश से यात्रियों का मेला भी भारी लगता है।
कुछ गंगा के दर्श से तो कुछ स्नान करके पवित्र होते है,
तो कुछ सूरज को पानी चढ़ा कर पुष्पों से पूजा करते है।
होते है कुछ जन जो मिठाई या खाद्य सामग्री गंगा में बहाते है,
तो कुछ अपने स्वर्गीय स्वजनों की अस्थिया बहाने भी आते है।
सूरज दादा से मिलने के बाद पानी स्वर्णमय सा लगता है।
मानो आसमान की बारी गयी, दिन भर रवि का राज ठहरता है।
*यही तो गंगा की खासियत है जिससे मिलती उन सम होती है,*
*फिर भी किसीकी की न होकर वो तो अपने में ही बहती है।*
-✍🕊 *प्रियंका(पंखी)*✍🕊

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