राजीव!.... खाना खा ले! नहीं " माँ " अभी नहीं, अभी मैं अपने दोस्तों से मिलने जा रहा हूँ! आकर खा लूँगा!!
"राजीव" जो कि विदेश में रहता था! अभी कुछ दिन पहले ही अपने गाँव आया था और अब कल जाना भी है उसे!
राजीव खेत की पगडंडी पर जाकर बैठ गया! कुछ ही देर में उसके सारे दोस्त आ गए!
अरे राजीव,तुम तो कल जाने वाले हो तोअभी से उदास क्यों है??
राजीव ने कहा! तुम लोग नहीं समझोगे मेरा दर्द, अपने गाँव, शहर और देश से दूर रहना क्या दर्द देता है, ये बात कोई परदेशी ही समझ सकता है! हर किसी को लगता है कि " परदेश में बहुत मौज है " लेकिन? कोई ये नहीं समझता कि बहुत कुछ खोना पड़ता है परदेश जाकर!
अपना देश, बहुत याद आता है दोस्त! राजीव के दोस्त भी उदास हो गये! राजीव भाव विभोर होकर आगे कहने लगा,
विदेश में रहने वाले के दिल में क्या क्या होता है सुनो??
कहते हैं ना कि " बेटियों को ही अपना घर छोड़ना पड़ता है,
और वही घर छोड़कर जाती है, पर सिर्फ बेटियों के लिए ही ऐसा नहीं है!
कुछ बेटों को भी ये दुःख झेलना पड़ता है! कुछ अपने लिए, कुछ अपनों के लिए! मजबूरी ही ऐसी हो जाती है, वर्ना कौन प्रवासी जीवन जीना चाहता है!
बचपन में हम कितना बेफिक्र होकर जीते थे, स्कूल से आने के बाद क्रिकेट खेलने जाना और पिता जी के डांटने पर, " माँ " का बीच बचाव करना! दोस्तों के साथ मौज मस्ती भरे दिन!
कभी लगा ही नहीं कि " ये बेफिक्री कुछ ही दिन रहेंगी "!
और फिर पूरी जिंदगी, इक जिम्मेदारी के बोझ तले बीतेगी!
" क्या कभी किसी ने समझा इस दर्द को "??? नहीं!
हर किसी के जुबान पर यही बातें रहती है कि एक लड़की ही त्याग करती है! जहाँ पली बढ़ी, उस घर को छोड़कर, सारी जिंदगी दूसरे घर में रहती है, माँ बाप से दूर! पर क्या?
ये किसी ने नहीं देखा कि" हम लड़कों को भी तो जिम्मेदारी के कारण, सिर्फ अपने माँ बाप ही नहीं बल्कि, अपने गाँव, शहर और वतन से भी दूर होना पड़ जाता है!
पूरी जिंदगी, स्कूल बैग की तरह हाथों में एक बैग और बैग में टिफिन का एक डब्बा! सुबह निकलो काम पर तो शाम को घर आओ नहीं तो रात भी हो जाये! यही हमारी कहानी है!
ये गाँव, दोस्त, मस्ती भरे दिन, माँ के हाथ का खाना, सुकून भरी नींद, सब पीछे रह जाते हैं! अगर कोई बेटा, इन जिम्मेदारी को निभाने में देर करे तो ये दुनियाँ वाले, उसे नालायक कहने से भी ना चुके!
राजीव ने एक गहरी साँस ली और फिर अपने अंदर के दर्द को बयां करने लगा!
ये दुनियाँ कहने लगती है " देखो फलाने का बेटा निठल्ला घूमता है "!!
ताने सिर्फ औरतों को ही नहीं सुनना पड़ता है, ये मर्दों के हिस्से भी आती है! कहने को तो" दो जून " की रोटी के लिए काम करना पड़ता है लेकिन...... इसी " दो जून " की रोटी में पूरी जिंदगी समाहित है!माँ बाप के फ़र्ज़ से लेकर बच्चों की पढ़ाई, उन्हें काबिल बनाने से लेकर, बेटियों की शादी, और ऐसो आराम के साधन भी इसी "दो जून" की रोटी में समाए हैं! दोस्त अपना घर और देश छोड़कर जाना बहुत कठिन होता है!
इतना कहकर राजीव घर की ओर चल पड़ा, माँ के हाथ का खाना खाने और कल जाने की तैयारी करने, आखिर कुछ मजबूरी अप्रवासी जीवन जीने को लाचार जो कर देती है!
दिल तो देश में ही छोड़कर जाते हैं लोग........!
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श्वेता कर्ण!

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