अब जागो धरा के हे नारी, अपना स्वयं उत्थान करो।
दृग से जो झर-झर बहती, उस निर्झर का परित्याग करो।
बिगुल फूंक निनाद स्वरों में, भृकुटी तान ललकार करो।
पग तल रहना छोड़ो तुम, अब सबला बन संहार करो

याद करो झांसी की रानी, वह लक्ष्मीबाई की कहानी है।
सन् 1857 की तलवार, अब हो चुकी बहुत पुरानी है।
अस्वीकार करो तुम कनक हार, वह तलवार उठानी है।
अपने लाज की रक्षा को, वही इतिहास फिर दोहरानी है।

इनकी सुन साहस की गाथा, तुमको यह समझाती है।
अपने अबालापन को छोड़ो, नारी शक्ति को बतलाती है।
डट, वीरगति को प्राप्त हुई, वह वीरांगना कहलाती है।
विकल वेदना ताख पर रख, सबक यह सिखलाती है।

मनु बनों तुम हे बाला, मणिकर्णिका सी हर वामा हो।
अभिन्न विटप की शाखा हो, तुम करुणा की दामा हो।
उद्धोष करो अब धैर्य भरो, तुम सर्वजगत की रमा हो।
बीत चुकी जो नारी जीवन पर, फिर ना वो अब समा हो।

सतेश देव पाण्डेय