सुख दुःख निभाना तो फूल को आता है।
शादी हो या मौत, साथ ज़रूर निभाता है।
डरो ना ज़मानेसे, बड़ा कमज़ोर होता है।
जब हम डर जाते है उसे ज़ोर आता है।
पुरानी यादें आज भी सताती है हमको।
वो सुकूँ भरे दिन, आज क्या तमाशा है।
हक़ हमारा ज़िन्दगी पर तब तक ही है।
जिस्म से दूर रूह को बुलावा आता है।
रिश्ते सभी निभाते, पेड़ पौधे या प्राणी।
एक इंसान ही है जो उसे तोड़ जाता है।
खंडहर हर शहर गाँव में मिल ही जायेगा।
बर्बाद मुहब्बत की कहानी जो सुनाता है।
कौन कहता है तिजारत में नुकसान होता।
मुहब्बत के बाजारमें ये नहीं देखा जाता है।
किसी पर क्यों भरोसा रख कर जीते हो।
खुदा पर भरोसा करना, कामयाब होता है।
फिरोज दहिवाला

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