सुख दुख में रहती साथ सदा, प्रकृति तू सबकी आली है।

हर दृश्य तेरा अनुकूल सदा,  तेरी हर छटा निराली है।

तेरी काली शांत रजनी, दुःख में गाती है रुदन गीत।
धीरज देती कोई अपनी, जैसे हो मेरी सत्य मीत।
मृदु मंद वायु तेरी सजनी, चित को सहलाती पूर्ण प्रीत।
मैं बाला तू मेरी जननी, ममता से लेती हृदय जीत।

है जग तेरा प्यारा उपवन, तू जैसे सबकी माली है।

हर दृश्य तेरा अनुकूल सदा, तेरी हर छटा निराली है।

तेरे पेड़ों के ये झुरमुट, दुःख में लगते तम छाया सी।
पत्तों पर तुहिन ओस नित उठ,अंकित रोदन की बूंदों सी।
वर्षा की बूंदों की छम छम, लगती निज व्यथा में सहचर सी।
घन अंधकार में चमक तड़ित, सहसा देती नव आशा सी।

तू देती कभी न लेती है, तू मुक्त हस्त निधि वाली है।

सुख दुख में रहती साथ सदा,प्रकृति तू सबकी आली है।

नित नव ऋतु परिवर्तन कर, तू जीवन युक्ति सिखाती।
पतझड़ बसंत ज्यों अनुचर,सुख दुख को तू समझाती।
सरिता की धारा बहकर, निज कर्म पंथ बतलाती।
सुख दुख पीड़ा सब सहकर, जीवन लहरों में बहाती।

जिस भाव से तुझे निहारूं, तू नव पाठों की टोली है।

हर दृश्य तेरा अनुकूल सदा, तेरी हर छटा निराली है।
सुख दुख में रहती साथ सदा,प्रकृति तू सबकी आली है।.....✍️🙏🌅


❤️ ऋतु बाजपेई