बादलों की छटाये कुछ इस तरह मेरे आँगना मे छा गई 
मै तो बिचारी  इनको खड़ी देखती ही  यह गई 

ज़िन्दगी पर ये  तो मेरे ग्रहण बन कर लग गई 
मौसम नहीं था कोई बरसात का फिर भी बरस गई 

जख्म पे ज़ख्म मैं तो अपनों का खाती चली गई 
मुँह से एक उफ़ भी ना निकली थी सब  सहती चली गई 

मै तो अपनी जिंदगी की बहारों को तरस गई 
सब के  होते हुए भी मै तो तन्हा सी रहा गई 

खुशियों की तलाश मैं निकली आँखो मे दर्द दे गई 
दस्ताने  मेरी उल्फतों की अर्श पर लिख गई 

कभी ख़त्म ना होने वाला इंतजार मेरी जिंदगी मे दे गई 
अश्कों से मुझे होने लगी है मोहब्बत ये मेरी आँखे कह गई 

आलिया खान.....