नशीले नैनों ने बहकाया है बहुत,,,,,,
आंखों में नशा भर और मत देखो।
घुंघराली जुल्फों ने भुलाया है बहुत,,,,,
झटककर गेसू राह मत रोको।
मर मर कर जिया हूं ।
मधुर मुस्कानों पर,,,,,
स्मित का मधुर तीर और मत फेंको।
तिल तिल तपा हूँ मैं!
यौवन के ताप से,,,,,
कुंदन तन लेकर करीब मत आओ।
ओ कामिनी,कजरारी,
कटीली नयनों वाली।
मन के संयम को आज मत तोड़ो।
कोयल की कूक से अब दिल हुलसता नहीं,,,,,
रसीलो अधरों से मधु मत छितराओ।
वसंत ,सावन शिशिर सभी भूला हूँ मैं!
रूप का मधुमास और मत पिलाओ।
भाव, भंगिमा ,नैन शब्दों के अर्थ ,,,,,,
मन में मोहन मंत्र और मत उकेरो।
ओ ओस कणिका, सदयः
कालिका,,,,
किरणों से भ्रमरों से अभी मत खेलो।
स्वर्गीय प्रेम शंकर पांडेय
गोरखपुर

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