भेज दो अहंकार को
कब्र मे तुम
क्यो सिर पर चढा कर
रखते हो ,
क्या मिलेगा इससे
अकेले ठूँठ से
खुद को खडे पाओगे
सब अपने बिसरा देगे
फिर भला क्या जी पाओगे
मै ,मै, मै ,करते उम्र खपाते
फिर खाली हाथ चले जाते
फिर क्यो इतराते
सब तेरा ही है तो कब्र मे
ले जाओ साथ
वहाँ अकेले जाते हो
मोह की गठरी खोलो
परम पिता से नाता जोडो
यही सत्य है
ज्ञान के चक्षु खोलो
अहंंकार तज कर
पूर्ण मानव बनो
और नव जीवन जी लो
अहंकार केबल
बिनाश की जड है
इसे कब्र मे दफन करो
निर्मल ,निश्चल
प्रेम की धारा बहाओ
यही जीवन है
यही जीवन है ।
मीनाक्षी शर्मा
भोपाल ,मध्यप्रदेश

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