सुनले नारी सुनले नारी रूह तेरी क्यू काँपी है ।
हत्यारी दुनियां ने तुझको कोख में ही त्यागी है।
कर गुमराह कोख में पलती
 छायी अब मायूसी है।
जीवन मे संघर्ष बहुत है
बढ़ती सबसे आगे है
नारी होने के खातिर 
भेदभाव से त्यागी है।
राह में रोड़े बहुत खड़े है
अपनो के जंजाल यहाँ।
सीधी बनकर रही तो नारी
दुनियां से तू भागी है।
ले अरमान हाथ मे अपने 
जिंदा ही तू जागी है।
अरमानो की गठरी को 
तूने खुद ही त्यागी है
कर संघर्ष  समर्पित होके
तूने देह ना त्यागी है।
बून्द  बून्द से सींचा जिसको
दुनिया बड़ी अभागी है



    संध्या पंवार