खुल जाएंगे भाग्य के ताले ,
बस एकबार ध्यान की चाबी लगाले,
ज्ञान के रेगमाल से मन की जंग हटाले,
क्यों किसी की आश मन से ,
लगाए बैठा है।
क्यों सर को झुकाए बैठा है
कर्म हीनता को भाग्य बनाए बैठा है।
उठ त्याग दे सारे आलस देख ,
बिना हाथ लगाए नही जाएगा,
निवाला मुह तक चाहे कोई,
कितने भी व्यंजन सजाए बैठा है।
भाग्य होगा उदित हो जा,
एकबार प्रयासित,
मत कर यों जीवन को,
अकर्मण्यता से प्रताड़ित।,
खुद को भाग्यहीन बनाए रहता है।
कौन सा ताला है जो न खुले कर्म से प्रहार कर,
बस एक बार दृढ़ निश्चय से एकचित हो बार कर,
सारी तिमिर निशाएँ राहों से छट जाएंगी,
सारे उजालों की चाबियां मिल जाएंगी,
क्यों पराधीनता का जीवन अपनाए बैठा है।
अंजू दीक्षित
बदायूँ,उत्तर प्रदेश।

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