क्या करे कि हम हास्य के किरदार रह गये
जिन्दगी भर केवल ख्वाब देखते रह गये
गिला रहा तमन्नाएं ना पूरी कर सके हम
रूठे नसीब मनाने ,खुद को जार जार कर गये
हक में थी मेहनत,वो भी की हमने एक मुद्दत
फिर भी नहीं मिला जिसे चाहा,एक मुद्दत
ए नसीबा क्यु खफा हो हमसे, देते ठोकरे हो
ये सजा मिली बदले ,उसे चाहा एक मुद्दत
कृष्णा की✍️ कलम से

0 टिप्पणियाँ