जब कभी भी मन मेरा हुआ व्यथित,
किसी भी दर्द से तपित,
प्रिय तुम संजीवनी बन गए।
जब कभी मन ने सजाए सपने,
जब कभी हम लगे थकने,
प्रिय तुम संजीवनी बन गए।
कभी डगमगाए जो कदम,
निराशाओं से भरा मन,
प्रिय तुम संजीवनी बन गए।
जाने अनजाने की मैने गलतियां,
जब भी दिल ने सिसकियां,
प्रिय तुम संजीवनी बन गए।
तुम मेरे जीवन के संकटमोचन हो
जब भी आये मुश्किलों के पल,
प्रिय तुम संजीवनी बन गए।
मुझे हो दर्द तो भरती पलकें तेरी,
मेरी मुस्कुराहटें जब हुईं मूर्छित,
प्रिय तुम संजीवनी बन गए।
प्रतिदिन मैं ईश्वर की हूँ आभारी
कोई विपदा मुझे छूने से है घबराती,
प्रिय तुम संजीवनी बन गए हो।
अंजू दीक्षित,
बदायूँ,उत्तर प्रदेश।

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