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काश तुम पढ़ पाए होते
आंसूओं के संग छलकती पीर को
कसक बेकरारी और दर्द की जागीर को।
जो पिघलती रही आंसू बन कर
बहती रही मन की पीर
बार बार उजड़ी फ़िर बसाई गई।
छटपटाती रही
गढ़ती रही उस हादसे के चित्र को
जिसने बदल डाली मेरी तक़दीर को।।
काश.....
उस वेदना की तासीर को ।
कभी तुम भी महसूस करते
उस अंतहीन व्यथा को।
जो छलकती रही गाहे बे गाहे
नयनों के कोरो से।
तड़पती रही ताउम्र
कुछ ख्वाहिशों की राख लिए।
शायद तुम जान ना पाओगे।
क्यूंकि बंधे हो तुम
कुछ अंतहीन वर्जनाओं में।
मणि बेन द्विवेदी
वाराणसी उत्तर प्रदेश

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