चापलूसी के इस आलम में,
सही को गलत और गलत को सही ना किया करों...।
खुद गुनाह करके तुम यूँ
ओरों की वकालत ना किया करों...।।
मिल ही जाएंगी एक ना
एक दिन मंजिल तुम्हें भी...।
तुम यूँ किसी की राह में
काटें ना बोया करों...।।
उदासी की बारिश में रोज
रोज भीग कर...।
तुम यूँ खुद के जज्बातों
को नीलम ना किया करों...।।
होकर किसी पर फिदा
सारा दर्द लेकर...।
तुम यूँ अपने दिल को
तड़पाया ना करों...।।
है तुम्हारे चारों तरफ
तन्हाई का कोहरा...।
तुम तन्हाई को तन्हा
ही छोड़ दिया करों...।।
आरती सुधाकर सिरसाट
बुरहानपुर मध्यप्रदेश

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