वो लड़की न जाने कहाँ गई
जो मेरे कड़े अनुशासन का विरोध करती थी
उसके बताये कपड़े न खरीदने पर चिढ़ती थी
वो लड़की न जाने कहाँ गई
जो काम न करने के लिए सौ बहाने बनाती थी
और बहाने न चलने पर बहस भी कर जाती थी
वो लड़की न जाने कहाँ गई
जो किचन में खड़े होने से भी कतराती थी
पूरा घर फैला हो फिर भी जमा बताती थी
वो लड़की न जाने कहाँ गई
–प्रीति ताम्रकार
जबलपुर

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