एक तेरे दरश को भटकती रही सालो साल 
तू आया ना कान्हा ,ना तेरा जवाब ।

आत्मा को परमात्मा से मिलन की आस
छोड़ दिया मोह दुनिया का अब क्या खास ।

जोगी ज्ञानी अखंड पाठ ना मेरे बस की बात
नाम तेरा ही आसरा वहीं करू अरदास ।

पाप पुण्य का भागी मैं करू जतन दिन रात 
नरक स्वर्ग  पता नहीं मुझको ,तेरे आस संसार ।

मल मल तन धोया रूप बदल दिया जैसे हालात
रूह कब की मेली मेरी जान ना पाया राज ।

झूट कपट सब दुनिया से तुझसे कैसा बंद 
राख हो गया इर्ष्या से तन कर ना पाया प्रेम अनन्त।


         रेणू सिंह